सवाल और शिकायतें














बैठे हैं आज गुफ्तगू करने
कुछ सवाल तुझसे पूछने
कुछ जवाब खुद को देने

क्या? क्यों? कैसे? हज़ार सवाल ज़हन में हैं
शिकायतों से भरा पन्ना हाथ में पकड़े हैं
क्या पूछूं, क्या कहूँ, कहाँ से शुरू करूँ
या चुपचाप बैठे तेरी ओर तकती ही रहूँ

नज़र उठाई तेरी ओर और यादों का सैलाब उमड़ आया
हाथ कस के थामे मुझसे वादे करते हुए तू याद आया
मेरी जुल्फों को पीछे करते और सीने से लगाते हुए तू
आज मेरी आँखों में आँसू का बवंडर ले आया तू

यादो को समेटकर कुछ कहना चाहा
शिकायतों की पोटली की गिराह को खोलना चाहा,
ना तू कुछ समझा पाया, ना ही मैं कुछ पूछ पाई
सवालों को अंदर दबाए, मैं वापस फिर चली आई।

—भूमि सिंह

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

The Chaos

Imperfect yet Perfect

A Mere Hug