सफर

















ख्वाबों को आँखों में पिरो कर
निकल लिए हम इक सफर पर
जाना कहाँ-कैसे, पता कुछ भी नहीं
पर हौसला इतना कि निकल लिए अकेले ही

सफर में किसी अपने ने धोखा दिया, तो किसी पराए ने कंधा
कही दर-दर ठोकर खाई, तो कहीं अपनेन का सैलाब उमड़ा
कभी उम्मीदों ने दम तोड़ा, तो कभी हौसलों ने बुलंदी ठानी
कठिनाइयाँ आईं और टकरा कर चली गईं, पर हार हमने कभी ना मानी


निराशाओं का सामना कर तो लिया है, पर जीत का स्वाद चखना अभी है बाकी
थोड़ा-कुछ पा तो लिया है, पर बहुत-कुछ पाना अभी है बाकी
रास्तों पर चल तो लिया है, पर खुद की छाप छोड़ना अभी है बाकी
मीलों सफर तय तो कर लिया है, पर मंजिल को पाना अभी है बाकी

— भूमि सिंह

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